Monday, January 8, 2018

आधुनिक भारतीय नवजागरण काल में संघ की भूमिका

अगर छुआछूत कलंक नहीं है तो कुछ भी कलंक नहीं है...

                                                                     बाला साहेब देवरस
परिवर्तन प्रकृति का नियम है। सामाजिक संरचना भी प्रकृति के इसी नियम से चलायमान है। हिन्दु धर्म शैली में परिवर्तन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें बुराई के लिए अच्छाई का आगमान, असत्य को परास्त करने के लिए समाज का नवजागरण काल विद्यमान है। ठीक ऐसे समय में जब भारतीय समाज अंग्रेजों से मुक्ति के लिए प्रयासरत था, समाज में कुरीतियां और कुप्रथाएं अपने चरम पर थी। वैदिक भारतीय परंपराएं अपना दम तोड रही थी, वैश्विक गुरू कहलाने वाले भारत में शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जा रहा था,  ठीक ऐसे समय में ही समाज के एक नये परिवर्तन शील आध्यत्मिक युग की शुरूआत 1925 को दशहरे के दिन आरएसएस के रूप में हुई। डॉ.केशव राव बलिराम हेडगेवार जी ने इस विकृत होते समाज को फिर से एक स्वरूप में ढालने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक की स्थापना की।  यह वह समय था जब भारत एक ऐसा राष्ट्र बन गया था जिसकी प्राचीन महानता खण्डहरों में कहीं लावारिस  पड़ी हुई थी, उसका राष्ट्रीय साहित्य और विज्ञान, उसका अध्यात्म ज्ञान और दर्शन, उसका उद्योग और वाणिज्य, उसकी सामाजिक समृद्धि और गृहस्थिक सादगी और मधुरता लगभग अतीत की बात हो गई थी, ऐसे समय में आरएसएस ने समाज और देश को एक साथ जोडने का काम किया । डॉ. हेडगेवार जी ने 13 अक्टूबर, 1937 को विजयादशमी के दिन अपने प्रबोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के उद्देश्य को निरुपित करते हुए कहा था कि,“राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना केवल अपने स्वयं के उद्धार के लिए ही किया गया है।