Wednesday, April 8, 2020

एक रोटी के दो हिस्सों की कहानीः96


contentserver.com.au/assets/654565_96_v8.jpg75 एमएम पर्दे पर उतरने वाली हर कहानी में प्यार को कोई ना कोई हिस्सा जरूर होता है। कभी कोई कहानी महज़ कुछ घंटों तक अपना असर रखती है तो कुछ कहानियों को देखकर लगता है कि सारी जिंदगी ऐसी ही किसी कहानी के आसपास अलाव की हल्की आंच को सेंकते हुए काट  ली जाए। प्यार का होना उतना जरूरी नहीं है जितना प्यार को बचाए रखना। 96 एक ऐसी ही कहानी जिसे गुनगुनाने का ख़्याल फ़िल्म के हर बढ़ते हिस्से के साथ आपके ज़ह्न को उन रूमानियत में ले जाता है जहां आप खुद को रामचंद्रन और जानकी देवी के साथ खड़ा पाते हैं। फिल्म की शुरूआत भले ही एक अनजान सफर के साथ शुरू होती हो लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढती है प्यार का ख़ुमार और भी चढ़ता है। रामचंद्रन और जानकी देवी के कक्षा दसवीं से शुरू होते इस प्यार में आपको आपकी भी 10वी कक्षा में गणित या हिन्दी की क्लास के दौरान बैंच पर लखी गई कई कहानियां याद आ जायेगी।  रामचंद्रन (विजय सेतुपति) और जानकी देवी (त्रिशा कृष्णन) के बीच के बीच कैमस्ट्री दिल के किसी अंधेरे कोने में दबी यादों को आंखों के सामने लेकर आ जाती है। कहानी एकदम नई है। प्यार की आम कहानियों की तरह इस फिल्म में संडाध नहीं है।  स्कूल के पहले प्यार की खुशबू को जिंदा रखे हुए रामचंद्रन जब 22 साल बाद जानकी देवी से मिलता है तो उसकी घबराघट देखते बनती है। पूरी फिल्म में विजय सेतुपति की घबराहट से पहली नज़र का प्यार होने से ख़ुद को कोई नहीं रोक पायेगा।पूरी फिल्म में त्रिशा कृष्णन जिस तरह से अपने चेहरे के भावों से सारी बात कही है वह देखते बनती है। और हां अगर फिल्म देख रहे हैं तो गौरी किशन (कक्षा 10 की जानकी देवी) को नोटिस करना ना भूलिएगा, गौरी किशन की एक्टिंग दोनों स्थापित कलाकारों विजय सेतुपति और त्रिशा कृष्णन पर भारी पड़ती है।उनके अलावा इस फिल्म में फहाद फासिल, राम्या कृष्णन, समांथा रुथ  और मिस्किन ने अपनी-अपनी भूमिकाओं को पूरी इमानदारी के साथ निभाया है। कहानी के अंतिम हिस्से में आपको यकीन हो जायेगा कि प्यार कविताओं, चिठ्टियों और किस्सों में बंधकर रह जाने का ही नाम नहीं है। निर्देशक सी प्रेम कुमार ने बिना किसी लाग लपेट के कलाकारों से काम लिया है काबिले तारीफ है। उन्होंने बिना किन्ही शब्दों के यह बात साबित की है आंखे बोलती हैं। रिव्यू के हिसाब से फिल्म को 8/10 तो मिलने ही चाहिए।

Thursday, March 26, 2020

हिमालय के पैरों में चांदी की पाजेब -धर्मशाला

यहां की वादियों में हवाओं का पैगाम है, ठीक इसी जगह पर आकर धरती आसमान से अपने इश्क का इज़हार करती मिल जाती है। इस धरती पर स्वर्ग सिर्फ क़श्मीर में ही नहीं मिलता,धर्मशाला आकर भी आपको पहाडों से इश्क हुए बिना नहीं रहा जायेगा। पिछले कई महीनों से हिमाचल से दोस्त संदीप रोज़ाना ही फोन करके धर्मशाला आने का न्यौता दे रहे थे। जो इस बार दिवाली की छुट्टियां धर्मशाला में ही खर्च करने का फैसला ले लिया गया। हल्की ठंड ने अपनी दस्तक देनी शुरू कर दी थी और इस ठंड को साथ लेकर मैं धर्मशाला की ओर  
चल पडा।

Sunday, June 2, 2019

रूमानी किस्सों का अहसास है ये इश़्क




इश़्क के कई मायने होते हैं, कुछ आंखों से उतर कर दिल में हमेशा के लिए कैद हो जाते हैं तो कुछ आंखों ही आंखों में रह जाते हैं. इश़्क हर दौर में मौजूद रहा है तो हर दौर में इश्क के मायने भी अलग-अलग होते गए है। इंदौर की वो गलियां जिनमें उपभोक्तावाद ने तेजी से अपने पैर पसारे औऱ देखते-देखते ही निमाडी और मराठी गीतों की धुनें ना कब पब, डिस्को और मॉल की रंगीनियों में लाउड हो गए किसी को पता ही नहीं चला। एक मध्यम कद काठी का शहर जब तेजी से अपने पैर फैलाता है तो वो सब आत्मसात कर लेता है। उसके चेहरे की मुस्कुराहट से लेकर आत्मा की सौंधी खुशबू सब मलीन हो जाती है। लेकिन इस दौर में भी इस शहर की एक जोडी आंखे बडी शिद्दत से इस बदलाव के बीच कुछ परिवर्तन को बडे गौर से निहार रही थी। स्वाभाविक उसका इस शहर को इस बदलना कुछ रास नहीं आ रहा था, और यही तड़प मनीषा के ये इश्क के रूप में हमारे सामने आया।