
एक सांस्कृतिक विरासत का अनुभव रखने वाला व्यक्ति जब कोई साहित्य लिखता है तो वह सिर्फ साहित्य नहीं होता आने वाले इतिहास के लिए एक दस्तावेज़ भी होता है आशीष कौल ने वही साबित किया है। रिफ्यूजी कैंप किसी टूटे दिल की दास्तां या दो बिछडे दिलों की महज़ एक कहानी भर नहीं है, यह जज्बातों का वो समंदर है जो अपनी विरासत, अपनी संस्कृति, अपनी सभ्यता और सबसे बढ़कर अपनी माटी से बिझड़ने और उससे मिलने की तड़प का सूनापन लिए ज़ह्न के किनारों से टकराता रहता है।

यह उस हर नौजवान की कहानी है जिसने केसर की ख़ूश्बू में गूंजती कश्मीर की घाटी को ‘वरव रोलिव,गोलिब या चेलिव’ के नारों में बदलते देखा, जिसने वादी के कई ख़ुशनुमा मौसमों को दहला देने वाली काली रातों में बर्फ की चादरों को लाल होते देखा। यह कहानी उस हर आदमी की जिसे वादियों ने अपने औलाद की तरह अपने दामन में समेट रखा था, यह दर्द है उस हर टूटे दिल का, जो अपनी सर-ज़मी से निकलते ही औरों के लिए रजिस्टर में दर्ज महज़ एक आंकडा हो गया। यह कहानी है उस इस्लाम की जिसे पाकिस्तान में कहवे की गर्म चुस्कियों के साथ मौसिकी में पेश किया जाता है और वादी में बंदूक से निकलने वाली गोलियों की शक्ल में। ये कहानी है उस इस्लाम की जिसने जेहाद-अल-अकबर और जेहाद-अल-असगर के बीच का फर्क समझे बिना ख़ुद को शरणार्थी में बदलकर एक लंबे और कभी ना ख़त्म होने वाले सफ़र में छोड़ दिया।
रिफ्यूजी कैंप सरकार के चेहरे पर एक करारा तमाचा भी है कि कैसे एक भारतीय अपने ही देश में रिफ्यूजी हो गया। उसके चेहरे से उसकी कश्मीरियत की पहचान मिटा दी गई, कैसे उसके आंखों के नीले-कत्थई रंग के रौनक की जगह, दहशत से भरे सूर्ख लाल रंग ने ले ली। ये कहानी है दर्द से उपजे उस हर गीत का जिसे गुनगुनाने का लहजा हम सबके दिल में कहीं टीस बनकर सिमट कर रह गया है, ये कहानी है, मेरी भी और आपकी भी, क्योंकि ये कहानी है वादियों में रहने वाले हमारे ‘हम-वतनों’ की।
KESHAV PATEL (BEST SELLER AUTHOR)
Book Review “Refugee Camp” BY Ashish Kaul
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